*"इस लाँकडाउन में”*
हम घरों में नहीं
आशंकाओं की
दीवारों के बीच कैद है
घिरे पडे है हम
एक अनजाने- सुनेपन से
जिसे भय ने
पसार दिया है हमारे बीच
हमारे पाँव ठहरे पडे है
राह आसां हो जाने की
आशा में......
हम रेंग रहे हैं घरों में
छिपकलियों की तरह
और हममे से कुछ
पडे हुए हैं -
मकडी के जाले की तरह
बस,
डुबते सूरज की चमक
लौटते पंक्षियो की चहक
भरते हैं कुछ खालीपन
देते हैं भरोसा
एक नए सुबह की
जिसके लिए जरुरी है
धैर्य एवं हौसले के साथ
इंतजार करना
अंधेरा छंटने का।
*शशि भूषण सिंह*


