ख़्वाबों की , लहरों में खोया,
प्रेम-विछोह में, जी भर रोया
अश्रुस्रोत भी , अब रीते हैं
दर्द , नए जख़्मों को सीते हैं
न अधर तृप्त, न मन प्राण ही
न कुंठा रही , न कोई मान ही
एक अंधी गली में , सब छूट गया
कच्चा था खिलौना , टूट गया
ये प्रियतम की राह नहीं ,अब
क्यों कंकड़ चुनकर ,फेंक रहे हो
किसका रास्ता देख रहे हो ?


