भूख इतनी थी के सपना धुंधला सा लगने लगा,
फिर भी सपनों को टूटने नहीं दिया,
क्या पता जाग जाऊँ तो भूख फिर से सताने लगे?
गरम पराठो मे देसी घी की खुशबु
और मिठास ठंडी-ठंडी लस्सी की,
लड्डू खयाली थे, पर उस्से पकने दिया।
क्या पता नींद टूटे तो भूख फिर से सताने लगे।
असल में सच और सपनों के बीच
सिर्फ एक निवाले की दूरी थी,
अधुरे भूख तो आदत सी हो गई थी,
पर सपना अधुरा रह जाता ये मंज़ूर ना था।


