हवाएं करती क्यों विश्राम नहीं?
नभ का क्यों कोई छोड़ नहीं?
दिखता क्यों फिर चहुं ओर वहीं?
आग जो जलाती है,
उसे पानी हीं क्यों बुझाती है?
समय क्यों इतना बलवान है?
क्यों सब एक दूसरे से परेशान है?
सूरज क्यों सबसे पहले जाग जाता है?
चंदा क्यों सारी दुनिया को चमकाता है?
तारों को हमपर हंसी क्यों आती है?
मन में है सवाल बड़े
ये सब दुनियां को क्या सिखाती है?
ओस की मासूम बूंदें,
पत्ते पर क्यों टिक जाती है?
फूल जो इतना मुस्काती है,
कांटे इनके हीं डाल में क्यों आती हैं?
धुआं ऊपर हीं क्यों जाती है?
लहरे क्यों अपनी राह बनाती है?
तूफ़ान क्यों मूड जाती है,
जब निश्चल पर्वत से टकराती है?
मन में है सवाल बड़े
ये सब दुनिया को क्या सिखाती है?
सुख दुख के क्यों साथी हैं?
दिन-रात-दिन के बाद क्यों आता है?
ये चक्र समझ ना आता है!
जीवन तो स्वतंत्र है,
परछाई इन्हें क्यों डराती है?
दौलत हम इंसानों को आपस में क्यों लड़ाती है?
जन्म लेने वाले हर जीव की मौत क्यों आती है?
कुदरत का ये खेल बिलकुल समझ नहीं आता है?
मन में है सवाल बड़े,
क्या एक हीं स्तंभ पर है ये खड़े?
पुरुषोत्तम(२००६ ई.)


