एक पहेली की तरहा है वो,जो मुझसे सुलझती ही नही,
एक गुमनाम सी ख़ामोशी है छाई ,ये खमोसियो के पहर भी हटते नही,
कोशिश बहुत की है, उन्हे दिल के मकान से निकालने की,
कम्बख्त, वो किरायेदार बने बैठे है ,किरया भी नही देते और घर से निकलते भी नही।।


एक पहेली की तरहा है वो,जो मुझसे सुलझती ही नही,
एक गुमनाम सी ख़ामोशी है छाई ,ये खमोसियो के पहर भी हटते नही,
कोशिश बहुत की है, उन्हे दिल के मकान से निकालने की,
कम्बख्त, वो किरायेदार बने बैठे है ,किरया भी नही देते और घर से निकलते भी नही।।