मुख पे चमक मधुर है वाणी,
पैदल चल कर आये हैं।
हाथ जोड़कर शीर्ष नवा कर,
सब से वो बतलायें हैं।
आम नहीं कुछ खास है दिन ये,
क्योंकि नेताजी घर आये हैं।
शहद घुली है बातों में,
वादाे के तीर चलाये हैं।
पैर पकड़ के बूढी माँ के,
आशा के नयन उठाये हैं।
फिर सीना चौड़ा कर के वो,
अपनी उपलब्धी गिनवाये हैं।
राजा बनकर रहने वाले,
भिक्षुक बन के आये हैं।
इतना सब कुछ देख कर बूढी माँ गुस्सायी,
भावशून्य की स्थिति से अब वो बाहर आयी।
अपनी अभिव्यंजना को वो रोक न पायीं,
शीर्ष खड़े नेताजी पर वो खुलकर चिल्लायीं।
कहाँ थे वो चार साल,
जब खाने को तरसा समाज।
पीने के पानी को लेने,
चलती थी मैं अपार।
टूटी थी सड़कें जिनकी ना किसी को शुध् थी,
घरों में बिजली महिनों गुल थी।
आप तो गद्दी के नशे में चूर थे,
कुर्सी के लिए लोगों के तलवे चाटने को मजबूर थे।
लोग अपनो से बिछड़ रहे थे,
और आप मंदिर मस्जिद पे लड़ रहे थे।
सर्दी के उस महिने जब आप महोत्सव मना रहे थे,
हजारों बेघर खाली पेट तारों की चादर ओढ़ के सोने जा रहे थे।
जब तब शुध् नहीं थी तो आज क्याें आयी,
वोटो की लालसा तुम्हें यहाँ तक ले आयी।
नेताजी ने मौन खोला,
धीमे स्वर में सब से बोला।
जो हुआ वो भूल जाइए,
हम भी तो इन्सान हैं हम पर तरस खाइए।
इस बार जो भी हुआ,
हम सब की जाँच करवायेंगे।
बस एक बार हमें और मौका दिजिये,
हम देश बदल के दिखायेंगे।