ख़्यालों में आती है, बचपन के घर की खिड़की,कई बार । देखता हूँ जब, मैं , उसके आर पार, दिखाई देते हैं मुझे, रंग, कई हज़ार।   हरियाली ही हरियाली चारों तरफ, गहरी धूप में छाया चारों तरफ, खेत खलिहान चारों तरफ, पंछियों की उड़ान चारों तरफ ।   कभी कभी उस खिड़की से, जाती रेलगाड़ी देखी। कभी कभी उस खिड़की से, आती बैलगाड़ी देखी।   उस खिड़की से देखा, चाँद निकलता रात को, उस खिड़की से देखा, सूरज ढलता शामों को । उस खिड़की से मैंने सितारों को निहारा था, उस खिड़की से आता सूरज का चमकार था ।   बैठ जाता था, जब,उसके पास, खुल जाती थी, दिल की, कोई, बन्द किताब, मन मगन सा हो जाता था, ख़्यालों की नदिया में, दूर तक बह जाता था.......