जैव विविधता दिवस विशेष

  ।। धरा रुदन।।

    (प्रकृति संरक्षण)

विकलित विचलित हिय भाव धरे

स्वयं संशित सृष्टि रुदन करे

ये मातृ प्रेम का शोक परम

यहां पुत्रो का छूटा मातृधर्म

निज मां का आंचल लूटा निर्मम

हुआ चहुंओर विराजित दुराकर्म


हुई रुष्ठ धरा जल अश्रु धर

संताप मिटे न अकुलाकर

जो दिया सुत को दुग्धपान निमित्त

किया भरण पोषण उपयुक्त

उस मां का क्यों संहार किया

क्यों विष पोषित उपहार दिया


जिस विजय को तूने गाया है

जिस पथ को तूने अपनाया है

जिस प्रकृति का उपहास किया

जिस पाश का निज प्रयास किया

वह पाश तुझी को लिपटाएगा

काल रोष से न बचने पाएगा


है समय सेष तू संभल अभी

कर ख़ाक सुपुर्द अब पाप सभी

आचरण प्रकृति के युक्त बना

संरक्षण , विकास के संयुक्त बना

हे मानव स्वयं संयोजित हो

मुझको अपने उपयुक्त बना