देखो,

तुम भी तो मेरे ही जैसे हो,

फिर क्यूँ सब कहते हैं कि तुम अलग हो।


तुम्हारी आंखे भी तो खो जाती हैं,

उस सूने आकाश में,

जो खुद भी अपनें खालीपन से बेचैन दिखता है।

और माँगता है तुम्हारी नम आंखों से जिंदगी।

अलग अलग रास्तों पर चलकर भी तो हम दोनों एक ही जगह ठहरते है,

फिर साथ चलनें में गुरेज़ कैसी।

 ये केसरिया और हरे मजहबी रंगों में हम दोनों अलग यूं ही नही नज़र आते है,

ये एक साजिश है उन सियासत दारो की जो चाहते हैं हम दिखे एक दूसरे से अलग ,एक दूसरे से खिलाफ,एक से दो।