मैं,
वो लकड़बग्घा हूँ
जो घण्टों से बैठा है
घात लगाए,
काली रात में,
चमकती हरी आंखों से,
ऊँघता, जम्हाई लेता,
दलदल के मुँडेर पे,
इंतज़ार में, फंसने के
किसी जंगली भैंसे के...
जिसे पीछे से,
ज़िंदा नोंच सकूँ
खसोट सकूँ,
आराम से उसकी चमड़ी की
परत दर परत उधेड़ सकूँ,
उसका पेट फाड़
उसमे पलते
नरम बोटी से
अपनी भूख बड़ा सकूँ
अपने थूंथन को
उसके ख़ून से रंग,
अपने होठों पे
जीभ फिरा सकूँ
फिर, हू-हू रोकर,
गा सकूँ
अपनी कुटिलता की शौर्यगाथा
शेरों का झुंड आएगा,
गिद्ध,चील मंडरायेंगे,
सियार- भेड़िये भी कतार में होंगे,
वो धीरे धीरे मरती रहेगी
मैं हौले हौले विजयी होता रहूँगा....
#संजॉय


