तुम सामने थी, मगर ----
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कितना करीब था चाँद उस रात
फिर भी चाँद सी दूरी थी
हम देख भी ना पाये उन्हें करीब से
बस ऐसी ही मजबूरी थी
हमारी नजरें कहीं दाग ना लगा दें उन्हें
ये कोशिश भी जरूरी थी
खुशबू से उनकी, महक रही थी शमां यूं तो
हमारे लिये तो मृग कस्तूरी थी
तिरछी नज़रों ने उनकी यूँ छुआ था
कि कुछ अलग सा मुझे हुआ था
समंदर सी प्यास में ये पल भर की निगाह
अधूरी थी
कितना करीब था चाँद उस रात
फिर भी चाँद सी दूरी थी।

