चार दिन पहले सच्चाई रोने लगी ,
कर बद्ध मलिन मुख , असत्य से कहने लगी ,
हूं अपराधी मै तेरी सत्य है ये क्यों ,
कि पुरजोर विरोध करती हूं तेरा।
मैं तुझसे अभिन्न हूं , तू मेरा ही जन्य है ,
आज तेरा साम्राज्य है और ये मेरा दुर्भाग्य है ,
करती हूं स्वीकार मैं, हूं तेरी गुनहगार मैं ,
आज तेरे सभागार मे, हूँ बन्दी खड़ी।
जो भी तेरा दण्ड हो वो मुझे स्वीकार है ,
क्योंकि आज भी कुछ दिलों में मेरा वास है ,
है रवि सा प्रज्जल्वित आज तेरा लोक है ,
और मैं, और दामन मेरा हुआ तार तार है।
सत्यवादी श्री हरिश्चंद्र से आज के मनुज तक ,
खो रहा है तेज मेरा और ये तेरा सौभाग्य है ,
बक्श दे मुझको, या दे दे दण्ड कोई ,
आज तेरे सामने हूँ खड़ी बेड़ीजड़ित।
उठा झूँठ चहुँ दिस दिशाएं डोल गयी ,
त्राहि माम् मा त्राहि माम की गूँज उठी ,
धरती थर्रायी और पर्वत सब डोल गए ,
उसके इक इक पग पर सबके सिंहासन डोल गए।
आ समक्ष सच्चाई के, झुक के आलिंगन किया ,
मातु मुझे माफ कर तू ,तेरे बिन मैं हूँ हि क्या ,
तुझसे ही जन्मा और मनुष्यों में पला ,
जो भी हूँ बस एक भर्म हूँ , हूँ बहुत लघुता भरा।
चाह कर के भी मैं यहाँ कुछ कर सकता नहीं ,
कालचक्र के कुचक्र से कौन है लड़ता भला ,
तब चला था अब चला है और ये चलता रहेगा ,
गर ना समझा ये मनुज तो, सिया को निर्वासन मिलता रहेगा।
फिर भी देता तुझको एक मैं वचन हूँ ,
एक दिन ऐसा वो स्वर्णिम क्षण भी आएगा ,
तेरे तेज से निस्तेज मैं होके रहूंगा ,
शिव के तीजे नेत्र से भस्म हो जलूँगा।
पर वो परम सुखद क्षण कब आएगा ,
इसका निश्चय तो बस ये मानव कर पायेगा।
संतोष 'सशक्त '


