इक हुनरमंद, जीवन को मेरे रंगों से भर गया।

मेरे दिल ऐ मकां को कर वो घर गया।

इक पल नजर मिली, नशा उम्रभर का चढ् गया।

रुत थी पतझड़ को वो बसंत कर गया।


हुआ दीद ऐ दिलदार ,क्या हंसी शाम थी।

मेरे लिए खास उसके लिए वो शाम आम थी।

मौसम ने भी क्या खूब वो निभाई शाम थी।

लिखी थी रब ने ,कुदरत ने वो गाई शाम थी।