उठो !

प्रभाती जगा रही है.

सोए अरबाज जीवों को.

अपने सरगम स्वर प्रसार से

नूतन पथ पर लगा रही है.


उठो !

प्रभाती जगा रही है।।


पूरब में अब नहीं लालिमा.

अपने सुंदर रूप दिखाती.

धूल धुएं से आतंकित हो.

किरणें ज्योति छुपाती जाती


रक्त रोशनी प्रात काल की.

भोर निशा में जो बिखरी वह

गहन कालिमा भगा रही है.


उठो ,!

प्रभाती जगा रही है.



मुर्गे की बांग कहां है

जो बिस्तर से हमें उठाए.

मंदिर की घंटी अजान भी.

नियत समय पर अब न जगाए.


दूर कहीं शुकवा डूबा है.

जिसकी अनुपस्थिति में अब तो.

भोर रोशनी मगा रही है


उठो !

प्रभाती जगा रही है



कांव कांव की ध्वनि भूली अब.

सूनी घर की मुंडेरें हैं.

चिड़ियों का कलरव भी गुम है

डाली पर सूुने डेरे हैं


बज अलार्म हमको बतलाता

मानव यंत्र समान हो गया

कोई अपना सगा नहीं है.


उठो!

प्रभाती जगा रही है।।


गौतम ऋषि अब नहीं निकलते.

ऋषि पत्नी भी निडर हो रही.

इन्द्र चंद्रमा की युति मिलकर.

युग दर्पण की खबर हो रही.


संकेतों की प्रभा निराली.

जो अनुबंधोंं के बंधन में.

खुद को खुद से ठगा रही है.


उठो!

प्रभाती जगा रही है.।।