मन से प्यारा, मन से सच्चा
और न कोई दूजा है।
अगर हमारा मन है सच्चा
यह व्रत है या रोजा है
भेद-भाव या धूप-छाँव की
बाधा से डरना कैसा
आलोकित करता है तम को
मन अवलम्ब अजूबा है।
शीत-उष्ण के भाव अनेकों
मन को उद्वेलित करते
अपनी तासीरों के बल पर
इसमें चंचलता भरते
मानव की मर्यादा का
संकेतक इसको कहते
स्वयम् सचेतक निज करनी का
किसने इसको बूझा है
स्तुति निन्दा का यही प्रवर्तक
सुख-दुख इसने झेला है।
अपने और पराये करता
रहता मस्त अकेला है
निज विवेक पर आधारित हो
जिसने सम बर्ताव किया
वही सृष्टि में सर्वोत्तम है।
उसको सब-कुछ सूझा है
मान और अपमान कदाचित्
जिसे नहीं भरमाता है।
यश अपयश के अपवादों से
जिसका रहा न नाता है।
गर्व नहीं जिसको अपने पर
या अपने अधिकारों पर
ज्ञात और अज्ञात उसी ने
अपने पन को खोजा है।
मन की अगर तरंग रोक लें
यही भजन है ईश्वर का
मन को खुला छोड़ देंगे तो
बन्धन बन जाता नर का
मन के हारे हार यहाँ है
मन के जीते जीत यहाँ
मन से बोये मन से काटे
मन से मन की पूजा है


