बेटी को जल्दी थी बड़ी होने की


 मैं चाहता था उम्र उसकी यहीं ठहर जाए


 वो उड़ के आसमां में छूना चाहती थी


 मैं उसे बस घोंसले में रखना चाहता था


 ख़्वाब उसके पूरे हो सारे मैं भी चाहता था


 मगर बाप इक था, ख़ुदग़र्ज़ ही रहना चाहता था 


 डर रहा था उसकी विदाई से


 उम्र भर की उसकी जुदाई से


 फिर से बस वो नन्ही गुड़िया हो जाए


 मेरी हथेलियों जितनी हो जाए


 खेले गोद में पहरॊ


 खेलते खेलते सीने पे सो जाए  ...