वो पूछते हैं तुम्हारा योगदान क्या
तुमने कुछ बेमानी शब्दों के सिवा कहा क्या
किया क्या इस जग को दिया क्या
मैंने कुछ कौतूहल हैं जगाये
कुछ मुरझायी आंखों को
कुछ नव स्वप्न दिये
कुछ अधरों को नव गीत
कुछ उरों को दे डाली नयी प्रीत
कुछ नयनों में दे डाला नीर
कुछ हृदयों को दे डाली पीर
कुछ विरह वेदनाएं जगा दी
कुछ सोयी चेतनाएं जगा दी
कुछ पीड़ाएं मैंने भोगी
कुछ स्वप्न मैंने जिये
कुछ अमृत बांटा, कुछ गरल पिया
कुछ तिल -तिल मरा मैं
कुछ पल -पल में युग-युग जैसे जिया
मत पूछना फिर मुझसे मैंने क्या किया
मैं इस तरह क्योंं जिया
जब पास प्यार था ,प्रीत थी
सामने खड़ी दिख रही
जन्मों की जैसे जीत थी
फिर क्यों मैं डर गया
मुड़ा और पीछे खींचें पग अपने

