आंखो में सौ स्वप्न लिए,छोड़कर अपना सब कुछ,घर अपना
एक लड़की बनकर दुल्हन शौक से नये घर आयी थी
उम्मीद उसको थी वो एक दिन सबको अपना बना लेगी
क्या हुआ जो आज वो इस घर के लिए परायी थी
सिखाया था पुराने खयालों की मां ने इस घर से डोली उठी
उस घर से तेरीअर्थीउठे इसी में मैं समझूंगी तूं मेरीजायीथी
लड़की जैसे सपनों की सतरंगी दुनिया में खोई थी
मां नेअपनीससुरालकी कितनी सुखद कहानियांसुनायीं थीं
मगर यहां हकीकत कुछ और ही निकली ,एक एक कर
ख्वाब सब टूटने लगे तन मन पर खरोंचें कितनी आयीं थीं
हर रोज तानों का नया सिलसिला ,नई नई कुछ मांगे
जिंदगी जैसे जहन्नुम की इक मिसाल बन कर रह गयी थी
लड़की के मन में मां की सीख कुछ इस कदर भरी थी
की मां बाबूजी को फोन पर अपनेभी दुख न बता पायी थी
पति के परिवार के मन में नये ही खयाल पलने लगे
उसकी सहमी बेआवाज़ सिसकियों से भी वो जलने लगे
दुखों का बोझ इतना कि जैसे जीवन ही बोझ हो गया
फिर एक दिन मां बाप के घर उसके जलने की खबर आई
समझो तुम्हीं जरा खुद जली थी या जलाई गयी
मां बाप के दुखों आंसुओं का पारावार न था
क्या सचमुच शादी होते ही वो इतनी परायी थी
बेटियों के हर मां बाप तुमसे है इतनी सी गुजारिश
डोली और अर्थी की सीख इस तरह मत देना
कि घुटती बेटियां तुम्हें दुख दर्द अपने बता भी न सकें
जब चलीं जायें तो चाहकर भी उनको वापस बुला न सको

