बचकर रहना खानाबदोश आदमीसेजो आया है तुम्हारी गली में
कल आया था ,अब दिल में घर बनाने लगा है
देके उदासियां अपनी आंखों की औरों की आंखों में
जो कभी कभी सबको रुलाने लगा है
नयी कलियों को तो जगाया ही उसने
कुछ मुरझाए फूलोंको भी फिर से खिलाने लगा है
कुछ बदला बदला सा है समां इस गली का
कितने दिलों में नयी ख्वाहिशें नये ख्वाब जगाने लगा है
हमने समझा था होगा कोई यूं ही चला जायेगा
पर अपने खयालों से हमें चौकानें लगा है
लगता है उसकी खुद की नींदें हैं उड़ी उड़ी
हमारी आंखों से भी नींदें उड़ाने लगा है
हमें पता भी न चला कब चुपके चुपके
वो अपना होकर हमें अपना बनाने लगा है
रहता है सामने तो आता है करार सा,सुकून सा
नहीं दिखता तो बेकरार कर जाने लगा है
महके गुलशन सा ले आया है खुशबुएं कितनी
खयालों से अपने हमें भी जरा महकाने लगा है
क्या कहें उसकी नादानियांऔर शरारतों का
वो शरारतों से अपनी लबों पर हमारे मुस्कान लाने लगा है
जैसे दिल पर अपने रहा नहीं अब काबू हमारा
छीनकर हमको हमी से कहीं और ले जाने लगा है
छुपाकर अपनी सारी उदासियां, अक्सर
वो भी संग हमारे अब मुस्कराने लगा है
कुछ अलग कुछ जुदा से हैं अंदाज़ उसके
रुह से रुह तक सदाएं पहुंचाने लगा है
िल

