जीवन में सुख आता है जाता है
आने वाले इक पल का आभास नहीं
पर मनुज आने वाले कितने वर्षों के
स्वप्न सजाता है
कल कर लेंगे स्वप्न अपने
कल कर लेगें पूरी इच्छाएं अपनी
ये सोच उन्हें टालता जाता है
सुख की चाह में
जीवन की राह में
उम्र भर बस साधन ही
जुटाता रह जाता है
जब तक समझे सत्य ये
कि चीजों से सुख मिलता नहीं
हाथों से जैसे समय फिसल जाता है
कौन यहां पर साथ किसी के
जीवन के उस पार भला जाता है
जैसा भी हो,जो भी हो
संबंध इस संसार के,जो भी हो नाता
बस शमशान तक ही जाकर समाप्त हो जाता है
जिस शरीर, रुप पर दर्प इतना ,अभिमान इतना
चिता की वेदी में जलकर
भस्म हो जाता है, कुछ अस्थियां
थोड़ी राख शेष बस यही रह जाता है
कब कहांं किसके लिये
रुकता है जीवन
कब इस धरा पर
जीवन प्रवाह ठहरता है
औरों के लिए मनुष्य जीवन भर
जीता रह जाता है
कितने अनचाहे पथों पर है चलता
कितनी पीड़ाओं के द्बीप से
होकर है गुजरता
अपनी इच्छाए,अपने स्वप्न
सदा ही दबाता है
कितने ही द्बेष ईर्ष्या बैर के
भाव पालता मन मेंं
सुख की चाह में
जाने कितनी मृगतृष्णाओं में
भटकता जाता है
दुख पालता
पालता मन मेंं
पीड़ाएं, भय,आशंकाएं इतनी
कि कई बार
सुख की सांसे लेना ही
जैसे भूल जाता है
जब तक न हो सुख अपने भीतर
औरों को सुख कौन भला दे पाता है
उद्बिग्न हो जब हृदय
शांति कब कौन कहांं पाता है
द्बेष ,क्रोध ईर्ष्या, पाली हो जिसके लिये मन में
वो उसे कब कहांं जलाती हैं
मनुष्य उसमें स्वयं ही जलता जाता है
सांसों के चलने से सांसों के थमने
के मध्य तक ही है बस सारा जीवन
अधिकार नहीं अपने जन्म पर
अधिकार नहीं अपनी मृत्यु पर यहां
फिर जाने किस बात पर लेकर
अपने अधिकार को
मानव मन इतना इतराता है
जीता अगर स्वांत::सुखाय
बिन औरों को पीड़ा पहुंचाए
औरों को ठेस लगाए
औरों को दुख पहुंचाए
चलता गर अपने चुने
अपने सपनों के पथ पर
तब कर पाता शायद
अपना भी भला
और जग का भी भला
सुख पाता स्वयं भी
दे पाता सुख औरों को भी
अनिल 27.09.2020

